21वीं सदी: हिंदी भाषा और तकनीक का साथ

Written by: Mayank

बातें और जानकारी मुसाफ़िर हैं और भाषा उनका साधन. अब मान लीजिए कि ये मुसाफ़िर किसी साधन पर सवार होकर ऐसी जगह पर जाते हैं जहां उनके साधन को अंदर जाने की इजाज़त ही नहीं है तो क्या होगा? अजी होगा क्या, उन मुसाफ़िरों को अंदर जाने के लिए साधन बदलना पड़ेगा. यानी कि उस इलाके में जो भाषा चलती होगी, उस पर सवार होकर अपने ठिकाने पर पहुंचना होगा. कुछ ऐसा ही हिसाब-किताब लोकलाइज़ेशन का है. अगर अपनी बात दूसरों तक पहुंचानी है, तो साधन यानी कि भाषा बदलनी पड़ेगी. ये काम शुरू में कुछ मुश्किल ज़रूर लगा लेकिन यहीं पर तकनीक ने हमारा हाथ थामा और इस काम को आसान बनाने में हमारी काफ़ी मदद की. बात अगर हिंदी की करें तो आज कई ऐसे टूल चलन में आ चुके हैं जिनकी मदद से लोग न सिर्फ़ हिंदी लिखने लगे हैं बल्कि दूसरी भाषा को अपनी भाषा में बदलकर उसे समझ भी रहे हैं. तो आइए जानते हैं कि इस नई सदी में लोकलाइज़ेशन के मामले में हिंदी का कद कितना बढ़ा और उसमें तकनीक का कितना अहम योगदान रहा.

इंटरनेट है तो मुमकिन है!

इस बात में दो राय नहीं है कि इंटरनेट ने दुनिया की शक्ल-ओ-सूरत ही बदल दी है. भाषा भी इससे अछूती नहीं रही. इंटरनेट क्रांति के शुरुआती दौर में अंग्रेज़ी का दबदबा होने के चलते इंटरनेट पर स्थानीय भाषाओं के कॉन्टेंट की हिस्सेदारी सिर्फ़ 3 फीसदी ही थी जबकि आज के समय में यह हिस्सेदारी बढ़कर 30 फीसदी हो गई है. बेशक इसमें हिंदी की हिस्सेदारी भी बढ़ी है. हालांकि, बात सिर्फ़ इतनी नहीं है. इंटरनेट पर धीरे-धीरे हिंदी के कॉन्टेंट में तो इज़ाफ़ा हो रहा था, लेकिन मामला यहां पर अटका कि यह लोगों तक पहुंचेगा कैसे? मतलब ऐसा समझ लीजिए कि गोदाम ज़रूरत की सभी चीज़ों से भरा है, लेकिन जिसको सामान चाहिए उसके पास चाबी ही नहीं है. मोबाइल और कंप्यूटर के की-पैड तो रोमन में ही चल रहे थे. यहां से तकनीक ने कमान संभाली और फिर धीरे-धीरे इंडिक की-बोर्ड और इनपुट टूल जैसे साधनों ने लोगों को हिंदी में लिखने-पढ़ने का चस्का लगा दिया. इसी का नतीजा है कि साल 2014 के बाद से इंटरनेट पर “समाचार” जैसे हिंदी शब्दों की खोज दोगुनी हो गई. अब लोग बेझिझक देवनागरी फॉन्ट में हिंदी का कॉन्टेंट खोजते हैं और हिंदी में लिखते भी हैं.

कल का गंगाधर, आज का शक्तिमान है

इसमें हमारी आपकी गलती नहीं है बल्कि समाज से लेकर सिनेमा तक, हिंदी लिखने-बोलने वालों को एकदम देसी और नीरस ही समझा जाता रहा है. मगर कहते हैं न, ‘सब दिन होत न एक समान’. बस, तकनीक के दौर में हिंदी के भी ‘अच्छे दिन’ आ गए. अब चाहे सोशल मीडिया हो या ओपन माइक इवेंट, युवा पीढ़ी के लोग हर मंच पर बड़ी शान से हिंदी में लिख और पढ़ रहे हैं. इतना ही नहीं सिने कलाकारों की नई पौध में विकी कौशल, आयुष्मान खुराना और राजकुमार राव जैसे कई कलाकार हैं जिन्होंने लोगों से जुड़ने के लिए हिंदी का भी इस्तेमाल शुरू कर दिया है. इन बातों का लब्बोलुआब यही है कि कल तक हिंदी लिखने-बोलने वाले जिस शख्स को नई पीढ़ी ‘गंगाधर’ समझती थी, आज वही उनके लिए ‘शक्तिमान (कूल डूड)’ बन गया है. दिलचस्प बात यह है कि आने वाले कुछ वक्त में जो जनरेशन इंटरनेट का इस्तेमाल करना शुरू करेगी उसमें से करोड़ों की संख्या में लोग हिंदी-भाषी होंगे और वे उसी भाषा में इंटरनेट का इस्तेमाल करेंगे. इस बात पर वज़न डालने के लिए बता दें कि 2011 के लैंग्वेज सेंसस के मुताबिक, हिंदी बोलने-समझने वाले लोगों की संख्या में 2001 के मुकाबले 25 फीसदी इज़ाफ़ा हुआ है. अब आप खुद ही अंदाज़ा लगा लीजिए कि उसके बाद के 10 सालों में यह संख्या और हिंदी कॉन्टेंट की मांग कितनी बढ़ी होगी?

हिंदी भाषा से ब्रांड्स की बढ़ी आशा

वैसे बाज़ार भी कमाल की चीज़ है. एक छोटी सी ज़रूरत कब बाज़ार का रूप धारण कर ले, कह नहीं सकते. इस सदी की शुरुआत में क्या किसी ने सोचा था कि हिंदी जैसी भाषा जो पहले सिर्फ किताबों, कवि सम्मेलनों तक ही सीमित थी वो एक दिन बाज़ार की ज़रूरत बन जाएगी. जानकारों की मानें तो भारत में मशीन टूल्स का बाज़ार 2020-2024 के बीच करीब 13 फीसदी तक बढ़ने के आसार हैं. आज गूगल और नेटफ़्लिक्स जैसे ब्रांड्स ने भी हिंदी की बढ़ती मांग को देखते हुए नई तकनीक के ज़रिए लोगों से जुड़ने की जुगत शुरू कर दी है. गूगल ने पिछले साल ही दिसंबर में मल्टीलिंगुअल रिप्रेज़ेंटेशन फॉर इंडियन लैंग्वेजेस (म्यूरिल) नाम से मशीन लर्निंग मॉडल लॉन्च किया है. यह मॉडल नया स्टार्ट-अप शुरू करने वाले, स्टूडेंट या फिर रिसर्च से जुड़े लोगों को हिंदी समेत 16 स्थानीय भाषाओं के साथ तालमेल बैठाने में मदद करेगा. इसके साथ ही नेटफ़्लिक्स की टीम भी अपने कॉन्टेंट को हिंदी भाषी लोगों तक पहुंचाने के लिए ऑटोमैटिक प्री-प्रोसेसिंग तकनीक पर काम कर रही है. इस तकनीक को बनाने का मकसद है कि गैर हिंदी भाषी कॉन्टेंट के ट्रांसलेशन की समस्याओं को कम किया जा सके और हिंदी भाषी लोगों तक उस कॉन्टेंट का सही अर्थ पहुंच सके. अब तो आप समझ ही गए होंगे कि तमाम ब्रांड्स की नज़र, दुनिया की चौथी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा हिंदी पर यूं ही नहीं है.

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